देवशयनी एकादशी की व्रत कथा सूर्यवंश के अत्यंत प्रतापी और धर्मप्रिय राजा मांधाता से जुड़ी है। यह कथा न केवल इस व्रत के महात्म्य को दर्शाती है, बल्कि संकट के समय ईश्वर पर श्रद्धा और धर्म के पालन का संदेश भी देती है।
पौराणिक व्रत कथा
प्राचीन काल में मांधाता नाम के एक चक्रवर्ती राजा राज्य करते थे। वे अत्यंत सत्यवादी, धार्मिक और प्रजापालक थे। उनके राज्य में प्रजा सुखी, समृद्ध और रोगमुक्त थी।
1. राज्य में तीन वर्षों का भयंकर अकाल
एक बार राजा मांधाता के राज्य में लगातार तीन वर्षों तक वर्षा नहीं हुई। नदियों और तालाबों का जल सूख गया, पेड़-पौधे मुरझा गए और अन्न का संकट उत्पन्न हो गया। प्रजा में त्राहि-त्राहि मच गई।
प्रजापति और प्रजा ने राजा से गुहार लगाई—“हे राजन! शास्त्रों में कहा गया है कि राजा के किसी पाप के कारण ही प्रजा कष्ट भोगती है। कृपया इस संकट से उबरने का मार्ग बताएं।”
राजा मांधाता अत्यंत दुखी हुए, क्योंकि वे जानते थे कि उन्होंने जानबूझकर कभी कोई अधर्म नहीं किया था। प्रजा के कष्ट दूर करने के लिए वे अपने कुछ विश्वस्त सैनिकों के साथ जंगल की ओर तपस्या और समाधान की खोज में निकल पड़े।
2. महर्षि अंगिरा से भेंट
जंगल में भटकते-भटकते राजा मांधाता महर्षि अंगिरा के आश्रम पहुँचे। महर्षि ने राजा का स्वागत किया और उनके दुखी होने का कारण पूछा।
राजा ने हाथ जोड़कर कहा—“हे मुनिवर! मैं पूरी निष्ठा से धर्म का पालन करता हूँ, फिर भी मेरे राज्य में तीन वर्षों से अकाल पड़ा हुआ है। कृपया इस विपत्ति से मुक्ति का कोई उपाय बताइए।”
महर्षि अंगिरा ने ध्यान लगाकर राजा को इसका कारण बताया:
“हे राजन! यह सत्ययुग है। इसमें छोटे से पाप का प्रभाव भी बड़ा होता है। तुम्हारे राज्य में एक ऐसा व्यक्ति है जो बिना अधिकार के कठोर तपस्या कर रहा है, जिसके प्रभाव से वर्षा रुकी हुई है।”
राजा मांधाता ने कहा—“हे महर्षि! किसी तपस्वी को दंड देना मेरे नीति-विरुद्ध है। कृपया कोई ऐसा उपाय बताएं जिससे उस व्यक्ति को क्षति पहुँचाए बिना मेरी प्रजा को अकाल से मुक्ति मिल सके।”
3. देवशयनी एकादशी व्रत का विधान
महर्षि अंगिरा ने मुस्कुराकर राजा को समाधान दिया:
“यदि तुम प्रजा सहित आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की देवशयनी (हरिशयनी) एकादशी का विधि-विधान से व्रत और पूजन करोगे, तो भगवान श्री हरि विष्णु प्रसन्न होकर समस्त कष्ट दूर कर देंगे।”
राजा मांधाता आश्रम से लौट आए और उन्होंने अपनी पूरी प्रजा, मंत्रियों और परिवार के साथ अत्यंत भक्तिभाव से देवशयनी एकादशी का व्रत किया, भगवान विष्णु की पूजा की और जागरण किया।
4. व्रत का फल और वर्षा
भगवान विष्णु की कृपा से व्रत समाप्त होते ही गगन में काले बादल छा गए और मूसलाधार वर्षा होने लगी। पूरा राज्य जल से भर गया, खेत लहलहा उठे और प्रजा का अकाल दूर हो गया। सभी लोग सुखी और प्रसन्न हो गए।
कथा का सार
इस कथा से यह सीख मिलती है कि देवशयनी एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के जाने-अनजाने में हुए सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और जीवन में आ रहे अकाल (कष्ट व बाधाएं) समाप्त होकर सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।